MANDLOI FAMILY

The founders of Indore

कम्पेल का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। यह परगना परमारों के समय उनका स्थानीय मुख्यालय था। पुराने प्रशासन तंत्र में अकबर ने मालवा को १२ सूबों में विभक्त किया था। तदनुसार परगना कम्पेल सूबा मालवा , उज्जैन सरकार के अंतर्गत आता था. उक्त कम्पेल पर लगभग सन १६०० में भी मंडलोई (ज़मींदार) परिवार के शासन के प्रमाण मिलते हैं।

मुगलकालीन इतिहास में कम्पेल के मंडलोई परिवार की भूमिका बड़ी ऐतिहासिक एवं महत्वपूर्ण रही है किन्तु १६५० से इसका अध्ययन करना श्रेयस्कर होगा।

तत्कालीन ज़मींदार राव राजा गणेशदास जी मंडलोई के पुत्र राव राजा बलराम जी थे। राव राजा बलराम जी को एक सिद्ध पुरुष ने कम्पेल से पश्चिम में १४किमी दूर ख्याता(खान) नदी के किनारे आवास बनाकर रहने का सुझाव दिया। उन्होंने सन १६५०-१६६२ के मध्य ख्याता (खान) नदी के किनारे रावले का निर्माण करवाया जिसे आज बड़ा रावला के नाम से जाना जाता है। इन्ही सिद्ध पुरुष ने राव राजा बलरामजी को वंश वृद्धि का आशीर्वाद दिया था। तत्कालीन नामी पहलवान जीतसिंह के साथ हुई लड़ाई में राव राजा बलरामजी मंडलोई को विजय प्राप्त हुई। हार बर्दास्त न होने के कारण पहलवान जीतसिंह ने धोखे से राव राजा बलरामजी व उनके साथियों की हत्या कर कम्पेल के पास एक खोह में फेंक दिया जिसे आज भी हत्यारी खोह के नाम से जाना जाता है। खुडेल ग्राम में राव राजा बलरामजी के नाम से आज भी स्मारक बना हुआ है। हत्या के समय उनकी गर्भवती पत्नी गौतमा बाई सा. को भी उस खोह में मृत समझ फेंक दिया था। एक गवली(चरवाहा) जिसका नाम मनकार था, ने अपने साथियों की मदद से उन्हें उस खोह से निकालकर सकुशल उनके भाई के पास धरमपुरी(धामनोद) पहुँचाया जहाँ राव राजा चूड़ामण जी का जन्म हुआ। वयस्क होने पर राव राजा चूड़ामण जी को दिल्ली ले जाकर मुग़ल दरबार से खोये हुए राज्य अधिकार फिर से दिलवाए गए। मुसीबत में काम आने वाले मनकार गवली को पीपल्दा गाँव की पटेली इनाम में दी गयी।

तत्पश्चात सन १७०० में मुग़ल शासक आलमगीर की मुहर की सनद से राव नंदलाल जी को उनके पिता राव चूड़ामण जी की मृत्यु के बाद यहां का शाषक घोषित किया गया।

राव राजा नंदलाल जी मंडलोई (ज़मींदार) का शासनकाल कम्पेल एवं इंदौर के विकास का स्वर्णिम काल रहा है जिसमे संमृृद्धि के नए आयाम स्थापित हुए। राव राजा नंदलाल जी का प्रशासनिक मुख्यालय महाल कचहरी से चलता था जो की जुनी इंदौर के परकोटे के अंदर थी।

राव राजा नंदलाल जी ने ही सन १७१५ में उस परकोटे के बाहर पहली आवासीय बस्ती की नींव रखी, जिसे अपने नाम के आधार पर नंदलालपुरा नाम दिया गया जो आज भी मौजूद है।

राव राजा नंदलाल जी ने इस स्थान की आर्थिक उन्नति एवं व्यावसायिक विकास से चिंतित होकर मुग़ल बादशाह से सायर (करमुक्त व्यापार) की अनुमति मांगी। फलस्वरूप ३ मार्च १७१६ को मुग़ल बादशाह द्वारा यहां सायर (करमुक्त व्यापार) की सनद द्वारा अनुमति प्रदान की गयी जिसके कारण यह क्षेत्र चौतरफा उन्नति करता हुआ मध्य भारत का व्यावसायिक केंद्र बना और आज वर्तमान में भी है।

यह सब राव राजा नंदलाल जी मंडलोई दूरदर्शिता एवं अथक प्रयासों के कारण ही संभव हुआ। इस स्थान की समृद्धि कई डाकुओं, पिण्डारियों, आसपास के सूबेदारों एवं राजाओं को खटकने लगी और लूटपाट के लिए लगातार आक्रमण होने लगे। उन्होंने उन सभी का डटकर मुकाबला किया। इस समय तक मुग़ल शासक की पकड़ ढीली हो गयी थी और पेशवा उत्तर की ओर बढ़ रहे थे। मालवा में शान्ति स्थापित करने के लिए और जन जन को लूटपाट से बचाने हेतु उन्होंने बाजीराव पेशवा बलाल से संधि करी। कालांतर में यहाँ पेशवा राज्य स्थापित हुआ जिसके सूबेदार होल्कर बने।

The historical documents in the Bada Rawala of the Rao Raja of Indore, dates back the family to the Mughal era where by Farman’s or Sanads given by the Mughal Badshah they were given Inami land. The oldest of these papers dates back to 1561 A.D.

Records show that Indore was actually a land in Kampel Pargana, Subha Malwa and Ujjain Sarkar.

The Pargana Kampel was part of Inami lands given to the family of the Rao Raja by the Mughal Badshah. The Pargana was large and extended from around present Indore till Narmada. They used the sir name Mandloi earlier which shows perhaps a history with Parmar era where the heads controlling Mandals were called Mandliks, in the latter half of the 18th century for some reason their sir name also included Zamindar.They are Brahmins by birth , Bharadwaj Goutra. They originally ruled from Kampel which is about 18 miles from Indore.

Indore city was located by the family’s forefather Rao Raja Nandlal Mandloi and some of the streets and parts of the city are still bearing the names of the family members such as Nandlal Pura, Nihalpura, Tejkaranpura ( where present Shani Gali also is located), Tara Devi Road, Daulat Ganj.

The earliest document shows that Rao Ganesh Das Mandloi Grandfather of Rao Raja Rao Nandlal Mandloi . His son Rao Balram was childless for a long time , he visited a sage to seek his blessings , and son by the blessings of the sage his son Chudaman was born. On the behest of the sage who lived near Kankeshwar Mahadev mandir in todays Juni Indore area at the bank of river Khan or Khyata as it was known then the family later decided to shift their head quarters at the place where the present Rawala is.

In the times of Rao Raja Nandlal the family decided to make the small kasba of Pargana Kampel a bigger city and the first establishment he made here was ’ Nandlal Pura’ which is still in his name here. Subsequently by 1715 documented judicial records show that in his lifetime the present Indore was born and named so. He was in fact thus its first Ruler.

These facts besides being available in Farsi documents which states that on ‘ 3rd of March 1716 ‘ the Mughal Badshah with his Royal seal gave permission to the request of The Rao Raja Nandlal for a Tax free zone or SEZ that we call today. This fact has also been cited in books written by historians ‘Shri Jadunath Sarkar ‘, ‘Sir John Malcolm’.

Swatantrya Vir Sawarkar has also mentioned these historical facts and my family in his book ‘ Hindu Pad Padshahi’. Sir Patrick Geddes also mention in his works on Indore ‘ Town Planning towards City Development’ that Juni (old) Indore bears remnants of Hindu and Muslim architecture.

The family has hosted many dignitaries in the past. To name a few ; “His Excellency The Late President Of India ,Dr. Sarvapally Radhakrishnan” , The late “ Prime Minister Of India Shri Morarji Desai”,“ Sir C.P. Ramaswami Iyer”, “ Shankaracharya Shri Swaroopananda Saraswati , “ Shankaracharya Kanchi Kamkoti Peetham Shri Jayendra Saraswati “, Swami Satyamitrananda ji Giri – Bharat Mata Mandir Haridwar”, “ Saint Mother Theresa “,Bharat Ratna Shri Ravi Shankar, Shri Balasahab Devrus, Shri Sudarshan Ji , Rajju Bhaiya, Mananiya Shri Ashok Singhal ji President VHP, US Ambassadors Mr. Robert Gohen and Mr. Richard Celeste to name a few.

Sanad from Mugal emperor granting Tax-free trade permission on 3rd March 1716
Rao Raja Rao Nandlal Ji Mandloi "Zamindaar"

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Bada Rawla

The royal residence of Mandloi family.